आज का जीवन मंत्र:विद्वान लोगों को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है, इस बुराई से बचना चाहिए

ब्रह्मर्षि

विश्वामित्र ने तय कर लिया था कि उन्हें भी वशिष्ठ ऋषि के तरह ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त करना है। लोग उन्हें राजर्षि कहते थे, लेकिन वे ब्रह्मर्षि बनना चाहते थे। इसके लिए वे तपस्या करने लगे।

विश्वामित्र तप कर रहे थे, उस समय मेनका नाम की अप्सरा उनके सामने पहुंची। विश्वामित्र मेनका से मोहित हो गए और उसके साथ समय बिताने लगे, लेकिन बाद में उन्हें अपनी भूल समझ आई और वे सोचने लगे कि इंद्रियों की तृप्ति के लिए मैंने ये क्या कर दिया?

विश्वामित्र ने मेनका को भेजा और वे फिर से तप करने लगे। उनकी तपस्या देखकर सभी देवता घबरा रहे थे। देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और बोले कि आप इन्हें ब्रह्मर्षि का पद दे दीजिए। ब्रह्मा जी जब प्रकट हुए तो विश्वामित्र बोले, ‘मैं ब्रह्मर्षि से कम पद नहीं लूंगा।’

ब्रह्मा जी बोले, ‘इसके लिए तो आपको और तप करना होगा।’ ये बोलकर ब्रह्मा जी वहां से चले गए और विश्वामित्र फिर से तप करने लगे।

देवराज इंद्र ने रंभा नाम की अप्सरा को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए भेजा। रंभा वहां पहुंची तो विश्वामित्र ने उसे शाप दे दिया कि तुम पत्थर की हो जाओ। ऐसा बोलते ही विश्वामित्र को याद आया कि मैं तो क्रोध कर रहा हूं। मैंने काम को तो जीत लिया है, लेकिन मुझे क्रोध को भी जीतना है। ऐसा सोचकर वे फिर से तप करने बैठ गए।

कुछ समय बाद ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले, ‘मैं तुम्हें ब्रह्मर्षि का पद देता हूं।’

विश्वामित्र बोले, ‘आप मुझे ये पद दे रहे हैं तो धन्यवाद, लेकिन मुझे ये पद ये संबोधन वशिष्ठ जी से प्राप्त करना है।’

इसके बाद सभी देवता वशिष्ठ जी के पास पहुंचे और पूरी बात बताई। वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि पद का सम्मान दिया। इसके बाद दोनों की शत्रुता समाप्त हो गई।

सीख

विद्वानों को अपने-अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है। इसलिए वशिष्ठ मुनि और विश्वामित्र के बीच शत्रुता हो गई थी। बाद में वशिष्ठ मुनि ने विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि का पद देकर ये संदेश दिया कि विद्वान लोगों को आपस में लड़ना नहीं चाहिए। ज्ञान किसी के पास कम और किसी के पास ज्यादा हो सकता है। विद्वान व्यक्ति को दूसरों के ज्ञान का भी सम्मान करना चाहिए, साथ ही दूसरों के अज्ञान को मान देना चाहिए।

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