डूंगरपुर : सादिक अली: जनजाति बाहुल जिले में आदिवासीयो के लोकतांत्रिक, सांस्कृतिक,ऐतिहासिक और संवैधानिक अधिकारों के हनन के खिलाफ छात्र संगठन भील प्रदेश विद्यार्थी मोर्चा ने जिला कलक्टर को न्याय पाने के लिए कई घण्टो धरना प्रदर्शन कर ज्ञापन दिया।
लोकतांत्रिक, सांस्कृतिक,ऐतिहासिक और संवैधानिक अधिकारो की माँग को लेकर छात्र संगठन भील प्रदेश विद्यार्थी मोर्चा ने कई घण्टो तक कलक्टर कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर अपने अधिकारों की मांग करते हुए जिला कलक्टर को ज्ञापन सौंपा।ज्ञापन में छात्र संगठन ने जनजाति बाहुल जिले में सभी तरह के क़ानूनन अधिकारों के बावजूद जनजाति के आदर्श महापुरुषों की प्रतिमा लगवाने में प्रशासन द्वारा सहयोग नही देते हुए भेदभाव का आरोप लगाया गया।
आदिवासी और छात्र संगठन की माने तो शहर के सदर थाना चौराहे पर 4 दिन पहले भील योद्धा पुंजा राणा की प्रतिमा का अनावरण हो चुका है इसके बावजूद सिटेक्स चौराहा जँहा पर भील कुलगुरु संत सुरमाल की प्रतिमा स्थापित करना प्रस्तावित था इसके बावजूद आज सोमवार को कैबिनेट मंत्री मालवीय वीर योद्धा पुंजा राणा की एक और प्रतिमा का अनावरण करने जा रहे है।14 अप्रेल को सदर थाना चौराहे पर राणा पुंजा भील की प्रतिमा स्थापना के बाद नगरपरिषद आयुक्त द्वारा 2 विधायकों समेत 150 लोगो के खिलाफ कटाई गई एफआईआर वापस लेने की मांग भी ज्ञापन में रखी है।
दूसरे का अधिकार प्रभावित न हो
दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एस. एन. ढींगड़ा बताते हैं कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में धरना-प्रदर्शन का अधिकार विचार अभिव्यक्ति के अधिकार में निहित है। अनुच्छेद-19 (1) के तहत विचार अभिव्यक्ति का अधिकार है। इसके तहत कोई भी नागरिक अपनी आवाज उठाने के लिए धरना-प्रदर्शन कर सकता है लेकिन यह धरना-प्रदर्शन कानून के तहत होना चाहिए। यानी अगर किसी इलाके में मैजिस्ट्रेट ने निषेधाज्ञा यानी धारा 144 लगा रखी है तो वहां धरना प्रदर्शन नहीं हो सकता। मैजिस्ट्रेट धारा-144 लगा सकता है।
अगर कोई इसका उल्लंघन करता है तो पुलिस उस पर कार्रवाई कर सकती है। साथ ही सरकार द्वारा तय इलाके में धरना और प्रदर्शन हो सकता है, जिस इलाके में इसकी मनाही है वहां प्रदर्शन नहीं हो सकता। विचार अभिव्यक्ति का अधिकार पूर्ण नहीं है बल्कि संविधान के अनुच्छेद-19(2) में वाजिब प्रतिबंध है और इसके तहत सरकार धरना प्रदर्शन को सीमित कर सकती है या फिर उस पर रोक लगा सकती है।