कमिश्नर डी.के. ठाकुर का फर्जी पत्रकारों के खिलाफ़ एक्शन प्लान? फर्जी पत्रकारों की जांच का पैमाना क्या?

कमिश्नर

लखनऊ। अभी दो दिन पहले कमिश्नर कार्यालय से यह आदेश जारी हुआ था कि सभी फर्जी पत्रकारों की जांच करके उनके विरूद्ध कार्यवाही की जायेगी जिससे की वास्तविक पत्रकारों को रिर्पोटिंग के दौरान आसानी हो।यह आदेश पारित होते ही फर्जी पत्रकारों की नींद और चैन हराम हो गया, साथ ही अब यह प्रश्न भी उठने लगा कि आखिर जांच के दौरान पत्रकार फर्जी है या असली इसका पैमाना क्या होगा?

जबसे कमिश्नर आफिस से यह आदेश जारी हुआ है तब से हर जगह चाहे सोशल मीडिया का कोई भी प्लेटफार्म व्हाट्स-अप, फेसबुक हो, या वरिष्ठ पत्रकारों को कार्यालय हो तथा सूचना विभाग का परिसर हो हर जगह बस यही चर्चा है कि आखिर इस जांच का पैमाना क्या होगा, कैसे सिद्ध किया जायेगा कि यह पत्रकार फर्जी है या असली?

राजधानी लखनऊ में हर गली, हर मोहल्ले में दर्जनों पत्रकार आपको देखने को मिल जायेंगे जिनका वास्तविक पत्रकारिता से कोई लेना देना भी नहीं है और जिनको खबर कैसे लिखी जाती है या खबर का आंकलन कैसे होता है यह भी नहीं पता बस स्वयं को पत्रकार मानकर धड़ल्ले से रौब जमाते फिरते हैं।

जैसा कि आपको याद होगा जब लखनऊ घंटाघर पर सीएए का विरोध शुरू हुआ था तक कुकुरमुत्ते की तरह फर्जी पत्रकार पैदा हो गये थे एक 600 से 700 की आईडी बनवाकर मोबाइल से वीडियों बनाकर यू-ट्यूब और फेसबुक पर डालकर अपने आपको स्वंय पत्रकार की उपाधि दे देने वाले यह तथाकथित पत्रकार राजधानी में हजारों की मात्रा में उपलब्ध हैं और इनके कारण वास्तविक रूप में जो पत्रकार हैं वह बेचारे अपने आपका परिचय तक देने में संकोच करते हैं। एक गुलदस्ता लेकर किसी भी पुलिस कर्मी के साथ फोटो खिचवाकर सोशल मीडिया पर अपलोड़ कर दिया या एवार्ड-एवार्ड खेल लिया बस बन गये पत्रकार।

वास्तविक पत्रकार डी.के. ठाकुर के इस अभियान का स्वागत करते हैं कि सभी नकली पत्रकारों को खोज खोज कर निकाला जाए और उनके विरूद्व कार्यवाही की जाए, परन्तु बात यह है कि खोज का पैमाना क्या होगा?

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असली और नकली पत्रकारों के अंतर का पता लगाने का बेहतरीन रास्ते के यह कई बिन्दु हो सकते हैं-
1. उत्तर प्रदेश सूचना विभाग द्वारा मान्यता प्राप्त होना चाहिये।
2. फ्री लान्स हो सूचना विभाग द्वारा (स्वतंत्र पत्रकार हो)
3. किसी भी सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त समाचार पत्र में कार्यरत होना चाहिये तथा संस्था के सम्पादक द्वारा जारी किया गया अधिकृत पहचान-पत्र होना चाहिये।
नोटः अगर इनमें से कुछ भी एक प्रमाण-पत्र किसी भी पत्रकार के पास उपलब्ध है तो उसे फर्जी पत्रकार नहीं कहा जायेगा बाकि सभी को फर्जी मनाकर कार्यवाही की जा सकती है।

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