सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के राजनीतिक दलों को मतदाता सूची से बाहर रह गए लोगों को दावे और आपत्तियां दर्ज कराने में मदद करने में निष्क्रियता के लिए फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी चुनाव आयोग के उस बयान के बाद आई है जिसमें चुनाव आयोग ने कहा था कि जनता की आलोचना के बावजूद किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल ने कोई आपत्ति या शिकायत दर्ज नहीं कराई है। आपको बता दें कि चुनाव आयोग बिहार में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कर रहा है। उसने कहा था कि किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल ने सार्वजनिक आलोचना के बावजूद कोई आपत्ति या शिकायत दर्ज नहीं कराई है।
सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को लगाई फटकार
जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने सीधे तौर पर राजनीतिक दलों को फटकार लगाई कि जब लाखों मतदाताओं के नाम मसौदा सूची से हटा दिए गए हैं। तो वे अपनी आपत्ति या शिकायत दर्ज क्यों नहीं करा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि 12 मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में से केवल तीन ही अदालत में क्यों हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि हम राजनीतिक दलों की निष्क्रियता से आश्चर्यचकित हैं। बीएलए नियुक्त करने के बाद, वे क्या कर रहे हैं ? लोगों और स्थानीय राजनीतिक व्यक्तियों के बीच दूरी क्यों है ? राजनीतिक दलों को मतदाताओं की सहायता करनी चाहिए।
यहाँ न आये ऑनलाइन दावा दायर करे – सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की पैरवी कर रहे वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि उन्होंने स्वीकार किया कि कोई भी बड़ी पार्टी आपत्ति दर्ज कराने के लिए अदालत में नहीं आई है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे कहीं से भी ऑनलाइन दावा दायर कर सकते हैं। उन्हें बिहार से आने की जरूरत नहीं है। आरजेडी की तरफ से पेश हुए मशहूर वकील कपिल सिब्बल ने स्पष्ट किया कि वह राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के सांसद मनोज झा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं न कि पूरी पार्टी का। वहीं, अभिषेक मनु सिंघवी की दलील थी कि उनकी याचिका में आठ विपक्षी दल शामिल हैं, जिनमें से अधिकांश मान्यता प्राप्त हैं। इस पर जस्टिस कांत ने उनसे पूछा कि अगर वे इतने सारे दलों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, तो उन्हें यह बताना चाहिए कि कितने लोगों ने आपत्तियां दायर की हैं।
ये बताए कितने बीएलए नियुक्त किए गए – सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साथ ये बताए कितने बूथ-स्तरीय एजेंट (बीएलए) नियुक्त किए गए हैं। अदालत में चुनाव आयोग ने बताया कि 1.6 लाख बीएलए हैं और उन्होंने अनुमान लगाया कि यदि प्रत्येक बीएलए प्रतिदिन 10 लोगों से मिलता है, तो 16 लाख लोगों तक पहुंचा जा सकता है। आयोग के वकील ने कहा कि यह व्यक्तिगत मतदाता की जिम्मेदारी है कि वह अपना पता बदलने या परिवार में किसी की मृत्यु होने पर इसकी जानकारी दे। उन्होंने राजनीतिक दलों पर असहयोग का आरोप लगाया।
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