जब कांशीराम ने किया बसपा का गठन
राहुल गांधी ने शुक्रवार को दावा किया कि अगर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जीवित रहे होते तो कांशीराम कांग्रेस की तरफ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होते। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि कांग्रेस ने अपना काम ठीक से किया होता तो कांशीराम कभी सफल नहीं होते। नेहरू का निधन 1964 में हुआ था। वहीं कांशीराम 1978 में पिछड़े वर्गों के हितों की वकालत करने वाले संगठन बामसेफ की स्थापना के साथ राजनीतिक परिदृश्य में उभरे। इसके बाद उन्होंने 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का गठन किया।
तो कांशीराम जी कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते
राहुल गांधी ने कांशीराम की जयंती (15 मार्च) से दो दिन पूर्व इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित संविधान सम्मेलन में डॉक्टर भीमराव आंबेडकर और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम की सराहना की। राहुल ने कहा, “कांशीराम जी समाज में बराबरी की बात करते थे। कांग्रेस अपना काम पूरी तरह से नहीं कर सकी। यही कारण है कि कांशीराम जी सफल हुए। अगर कांग्रेस ठीक तरह से काम करती तो कांशीराम जी कभी सफल न होते।” उन्होंने कहा, “अगर जवाहर लाल नेहरू जिंदा रहे होते तो कांशीराम जी कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते।”


कांशीराम को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग
राहुल ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 85 प्रतिशत आबादी की अनदेखी की है। राहुल ने कहा, “संविधान कहता है कि यह देश सबका है और सभी लोग समान हैं, लेकिन आज समाज को 15 और 85 प्रतिशत में बांट दिया गया है और फायदा केवल 15 प्रतिशत लोगों को मिल रहा है।” उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी, भीमराव आंबेडकर और कांशीराम तथा सावरकर के बीच एक बड़ा अंतर है। उन्होंने ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा, “गांधी (महात्मा गांधी) जी 10-15 साल जेल में रहे, लेकिन उन्होंने समझौता नहीं किया।
कांशीराम ने जीवन में कभी समझौता नहीं किया – राहुल गांधी
बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना जीवन समर्पित कर दिया, लेकिन समझौता नहीं किया। कांशीराम ने जीवन में कभी समझौता नहीं किया क्योंकि वह ऐसा कर ही नहीं सकते थे। यह कार्यक्रम कांग्रेस के पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अनुसूचित जाति (एससी) विभागों तथा उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सहयोग से इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित किया गया। पार्टी ने मंच से प्रस्ताव पारित कर कांशीराम को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग की। कांग्रेस का यह कदम 2027 चुनाव में दलितों को आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
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